कामायनी एक पुनर्विचार (Kamayani Ek Punarvichar) - Gyan Books
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कामायनी एक पुनर्विचार (Kamayani Ek Punarvichar) - Gyan Books
किताब के बारे में: जी. एम. मुक्तिबोध की आलोचना ष्कामायनीरू एक पुनर्विचारष् जयशंकर प्रसाद की महाकाव्यात्मक रचना कामायनी का गहन विश्लेषण है। इसमें मुक्तिबोध ने कामायनी की दार्शनिकए प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या करते हुए उसकी सीमाओं और वैचारिक अंतर्विरोधों को उजागर किया है। वे इसे एक ष्आत्मसंघर्ष की प्रतीकात्मक कथाष् मानते हैं परन्तु इसकी भाववादी दृष्टि और वर्गच्युत चेतना की आलोचना करते हैं। मुक्तिबोध कामायनी को प्रगतिशील विचारधारा के संदर्भ में पुनः पढ़ते हैं जहाँ वे मानव और समाज के बीच के द्वंद्व को मुख्य आधार बनाते हैं। यह आलोचना रचनात्मक समीक्षा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
Author: जी. एम. मुक्तिबोध (G. M. Muktibodh)
Pages: 184
Edition: 1919
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